उत्तर प्रदेश – गुरुवार की देर रात हरदोई जिले से आई एक खबर ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया। 17 साल का लक्ष्य मिश्रा, जो अभी कक्षा 11 में पढ़ रहा था, बघौली रेलवे ट्रैक पर क्षत-विक्षत हालत में मृत पाया गया। पुलिस का कहना है कि लक्ष्य ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या की है , लेकिन परिवार इस बात को मानने को तैयार नहीं है। परिजनों का आरोप है कि यह मौत पुलिस की लापरवाही, दबाव और डर का नतीजा है।
रेलवे ट्रैक पर पड़े लक्ष्य के शव की हालत इतनी भयावह थी कि पहली नज़र में पहचान कर पाना बहुत ही मुश्किल था। चेहरा बुरी तरह कुचला हुआ था। परिजनों ने उसके हाथ पर बने टैटू से उसकी पहचान की। यह देखते ही मां बेसुध होकर गिर पड़ीं। पिता की आंखें नम हो गई और घर में मातम पसरा हुआ था।
मोर्चरी के बाहर मां की चीखें
शुक्रवार सुबह जब शव पोस्टमॉर्टम के लिए मोर्चरी लाया गया, तो वहां का माहौल बेहद भावुक और तनावपूर्ण हो गया था। मां बार-बार एक ही बात कह रही थीं कि
“मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता… वो डर गया था… उस पर दबाव डाला गया था”
परिजनों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अगर समय रहते संवेदनशीलता दिखाई जाती, तो आज उनका बेटा ज़िंदा होता। मोर्चरी के बाहर कुछ देर तक हंगामा भी हुआ। लेकिन बाद में सीओ सिटी के समझाने और निष्पक्ष जांच के भरोसे के बाद माहौल शांत हुआ।
चार दिन पहले शुरू हुई कहानी
लक्ष्य की मौत से चार दिन पहले, 5 नवंबर को, उसका नाम एक मामले में सामने आया था। लखनऊ रोड पर स्थित एक जियो पेट्रोल पंप पर ऑनलाइन पेमेंट को लेकर विवाद हुआ था। बात इतनी बढ़ गई कि मारपीट तक हो गई।
पेट्रोल पंप कर्मचारी शिव ओम सिंह ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई, जिसमें लक्ष्य, उसके पिता पवन मिश्रा और दो अन्य युवकों पर हमला करने का आरोप लगाया गया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए लक्ष्य के पिता पवन मिश्रा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
परिवार का कहना है कि यहीं से लक्ष्य पूरी तरह टूट गया था।
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पिता का पुलिस से पुराना नाता
लक्ष्य के पिता पवन मिश्रा पहले पुलिस विभाग में सिपाही थे, लेकिन कुछ साल पहले उन्हें पुलिस विभाग से बर्खास्त कर दिया गया था। पिता की गिरफ्तारी और पुलिस केस का डर लक्ष्य के मन में बैठ गया था।
परिजनों का कहना है कि –
“वो बच्चा था… उसे समझाने की ज़रूरत थी, डराने की नहीं।”
आत्महत्या या सिस्टम का दबाव?
लक्ष्य की मौत के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं
क्या 17 साल का छात्र इतना मजबूत अपराधी था कि उस पर इतना दबाव बनाया गया?
क्या पुलिस को एक नाबालिग के मानसिक हालात नहीं समझने चाहिए थी?
क्या एक FIR किसी बच्चे की ज़िंदगी से ज़्यादा बड़ी हो गई?
पुलिस भले ही इसे आत्महत्या बता रही हो, लेकिन परिवार इसे सिस्टम की नाकामी मान रहा है।
पुलिस का पक्ष
सीओ सिटी ने मामले का सज्ञान लेते हुए कहा है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी। अगर पुलिस विभाग से किसी तरह कि गलती हुई है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी
उन्होंने बयान दिया
“हम मामले के हर पहलू से जांच कर रहे हैं। अगर किसी स्तर पर पुलिस की लापरवाही सामने आती है, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
एक मां का सवाल, पूरे सिस्टम से
लक्ष्य मिश्रा की मौत सिर्फ एक केस नहीं है। यह एक सवाल है
जिस उम्र में बच्चों के हाथ में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में FIR और पुलिस का डर क्यों?
जिस हाथ से वह भविष्य लिख सकता था, उसी हाथ के टैटू से उसकी पहचान करनी पड़ी।
हरदोई की यह घटना एक परिवार की निजी त्रासदी भर नहीं, बल्कि समाज, पुलिस और सिस्टम तीनों के लिए चेतावनी है कि न्याय सिर्फ कानून से नहीं, इंसानियत से भी होना चाहिए।
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